शब्द नित्य है। है। अर्थ नित्य है। शब्द और अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है। वही दैवी-वाक् है। उस दैवी वाक् का संकेत ही मेघ की गर्जना में हमें प्राप्त श होता है—
ये तीन अक्षर ही प्रजापति के महान् उपदेश हैं। कोई एक देशीय शास्त्र इन्हें कहने के लिए नहीं चाहिए। सब देशों और कालों में व्योम के प्रशस्त उदर में इन तीन अक्षरों का नाद भरा रहता है। मेघ ध्वनि समय-समय पर इनकी व्यञ्जना किया करती है। इन संकेतों के अर्थों को हम जब चाहें, जहाँ चाहें, सुन सकते हैं। व्यक्ति की शान्ति भी इन्हीं अर्थों पर निर्भर है।
देव, असुर और मनुष्य किसी लोक-विशेष में नहीं, यहीं पर मिलने वाली वृत्तियों के भेद हैं। देव, असुर और मनुष्यों के लिए एक ही सृष्टि प्रजापति ने बनाई है, एक ही नियम है, एक ही परिणाम वाले सुख-दुःखादि भोग हैं। इसलिए दैवी वाक् भी एक ही है; परन्तु रुचि वैचित्र्य से अर्थों में भेद कर लिया जाता है।
द-दाम्यत
देवों के लिए एक ही अनुशासन है- आत्म-शासन करो। ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-जय, साधनाएँ सब इसी के विस्तार हैं। व्यक्ति के जीवन के ये शाश्वत मन्त्र हैं। जहाँ प्रथम ‘द’ के अर्थों में जागरूक श्रद्दधा रहती है, वहीं शान्ति ध्रुव रूपेण विराजती है। जब भी कभी हम आत्मिक शान्ति के लिए प्रयत्न करेंगे, प्रजापति के प्रथम उपदेश को जानना ही पड़ेगा।
असुरों के लिए प्रजापति की वाक् क्या कहती है-
द-दयध्वम्
दया की उपासना करो। हिंस्र-प्रवृत्तियों का दमन करो, रक्त-पिपासा का संयम करो। हिंसा, युद्ध, भीषण अशान्ति के कारण हैं। आज तो चारों ओर लड़ाई की भेरी बज रही है। दाँत पीस-पीसकर सैनिक जंग के लिए कमर कस रहे हैं। एक हाथ में नंगी तलवार लेकर मुख से शान्ति का मन्त्र उच्चारण करने से शान्ति कभी होगी ? सच्ची शान्ति के लिए प्रजापति के अर्थों को मानना हो पड़ेगा। इस उपदेश को हम चाहे आज सुनें, चाहे दस बरस बाद सुनें, पर उसको बिना सुने गति नहीं।
समाज की जो विषमताएँ हैं, जिनके कारण पारस्परिक कलह मचा हुआ है, उनको दूर करने का यदि कोई उपाय है, तो प्रजापति का तीसरा उपदेश-
द-दत्त
दान दो, बाँटकर खाओ, पञ्चय मत करो, वितरण का पाठ पढ़ो। धन और उपयोग की सामग्री सबको प्रिय लगने वाली हैं। उनको अपने लिए ही चाहना स्वार्थ है। सबके साथ बाँटकर उनका भोग करना सुख-मूलक है। पूँजीपति और मजदूरों के झगड़े की बुनियाद क्या है, जमींदार और किसान का संघर्ष क्यों है, धनिकों में आपस में रगड़ा क्यों है? इसलिए कि सब अकेले ही धन का भोग चाहते हैं। दान-यज्ञ की भावना नष्ट हो गई है। मनुष्य जब तक उदार हृदय से धन का व्यवहार करते हैं, शान्ति से फूलते-फलते हैं। वे ही जब आपम-धापा मचाते हैं, तब अशान्ति उत्पन्न होती है। समाज की व्यवस्था चाहे जैसी बनाइए, केवल उसी से पारस्परिक द्वन्द्व नहीं मिट सकता। मनुष्यों के हृदयों में औदार्य होना चाहिए।
जैसे शस्त्रों की सीमा बाँधने से युद्ध की शान्ति नहीं हो सकती, उसके लिए ‘दयध्वम्’ की भावना चाहिए। ठीक वैसे ही व्यक्ति के धन की सीमा बनाने से आर्थिक शान्ति नहीं हो सकती, उसके लिए मनुष्यों में बाँटकर खाने का भाव या उदार आशयता होनी चाहिए। प्रजापति विश्वव्यापी शक्ति है, उसकी वाक् भी विश्वव्यापी है। उस वाक् के संकेत दम, दया और दान भी सब देश और सब कालों के लिए हैं।
द-दाम्यत
द-दयध्वम्
द-दत्त
(देखो-बृहदारण्यक उपनिषद. ५।२।१-३)