वैदिक विचारों का मेरे लिए बहुत मूल्य है। उनका मेरे जीवन पर पर्याप्त ऋण है। भारतीय संस्कृति की आत्मा की खोज करते हुए समस्त विचार-धाराओं और अभिप्रायों का पर्यवसान वैदिक साहित्य में होता है। उसी मधुमय उत्स से भारतीय अध्यात्म शास्त्र के निर्झर प्रवाहित हुए हैं। वैदिक विचार बुद्धि का। कुतूहल शान्त करने के लिए पण्डितों के हेतुवाद नहीं हैं। उनमें सृष्टि के अनुभूत सत्य हैं। विश्व चैतन्य की स्फूर्ति की प्रतीति पदे पदे इनकी भाषा में मिलती है। वैदिक कविता की भाषा जैसी तेजस्वी है, वैसा तेज तो कालान्तर की साहित्यिक शैली में नहीं मिलता। एक स्वर से भारतीय मनीषियों ने वेदों के इस पद को स्वीकार किया है। किन्तु आज के युग में परंपरा की मान्यताएँ पर्याप्त नहीं मानी जातीं। आज वैदिक अध्यात्म शास्त्र की महिमा और उपयोगिता को मानवीय हेतुवाद और जीवन में परखने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से भी यह साहित्य विलक्षण मूल्य रखता है।

इस युग की सबसे बड़ी उलझन वैदिक परिभाषाओं की खोज है। सायण ने हमें वेदों के शब्दार्थ से परिचित कराया। सायण की सहायता के बिना इस महासमुद्र में हम न जाने कहाँ होते। किन्तु यज्ञीय कर्मकाण्ड की व्याख्या के लिए मन्त्रों का विनियोग तो वैदिक अर्थों का एक अंश मात्र था। वेद के पश्चिमी विद्वानों ने सायण के प्रदर्शित मार्ग से वेदों का अनुशीलन किया, किन्तु उन्होंने भाषाशास्त्र और तुलनात्मक धर्म-विज्ञान इन दो नए अस्त्रों से वैदिक अर्थों की जिज्ञासा को आगे बढ़ाया। जो विद्वान् उनके प्रयत्नों से परिचित हैं, उन्हें जैसा श्री ई.जे. टॉमस ने डॉ. रीले की पुस्तक ‘वैदिक गॉड्स एज फिगर्स ऑव बाओलोजी’ नामक पुस्तक की भूमिका में लिखा है- यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वैदिक अर्थों के प्रज्ञान की समस्या का समाधान अभी नहीं हुआ। वैदिक मन्त्रों के अर्थ अभी तक ‘संप्रश्न’ के रूप में हमारे सामने हैं। उनसे सम्बन्धित अनेकानेक प्रश्नों का मुख अभी तक खुला हुआ है। वह समाधान और युक्तिपूर्ण विवेचन की अभी तक बाट देख रहा है। भारतवर्ष में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वैदिक अर्थों के प्रश्न को आमूलचूल झकझोरा। उनका यह श्रेय है कि उन्होंने निरुक्त और ब्राह्मण ग्रन्थों की प्रतिपादित अर्थ विज्ञान-शैली को प्रतिष्ठा प्रदान की। उनके प्रदर्शित सिद्धान्त की सहायता से उपलब्ध सामग्री का सर्वांग निर्वचन अभी कर्तव्य शेष है। समस्त वेदों का पर्यवसान अध्यात्म विद्या में है। यह दृष्टिकोण स्वामी दयानन्द ने अपनी विशाल प्रज्ञानमयी प्रतिभा से जिस दृढता से रखा, उससे वैदिक अर्थों की शैली सचमुच बहुत लाभान्वित हुई। वैदिक अर्थों की प्रधान समस्या ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रदर्शित विज्ञानमयी परिभाषाओं का स्पष्टीकरण है। उदाहरण के लिए गायत्री और सावित्री में क्या अन्तर है? ‘वाक् इन्द्र है’, ‘प्राण इन्द्र है’, ‘मन इन्द्र है’, ‘हृदय इन्द्र है’, ‘दक्षिण अक्षि में जो पुरुष है, वह इन्द्र है’, विष्णु और इन्द्र दोनों स्पर्धाशील देव एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं, दोनों की जय-पराजय मानवी जीवन का सम्वर्धन और हास है- इत्यादि सैकड़ों-सहस्रों प्रकार के गूढ़ संकेत ब्राह्मण ग्रन्थों में सुरक्षित हैं। या तो वे निरर्थक कहकर त्यागने योग्य हैं या उनके पीछे युक्तियुक्त अर्थ अभिप्रेत है। इस विप्रतिपत्ति का समाधान आवश्यक है। वैदिक अर्थ विज्ञान की इस शैली को वेदसमुद्र श्री पं. मधुसूदन ओझा ने अपने शताधिक ग्रन्थों में और उनके प्रमुख शिष्य श्री पं. मोतीलाल जी शास्त्री ने अपने विपुल हिन्दी ग्रन्थों में सप्रमाण पल्लवित किया है। वेदार्थ के जिज्ञासुओं के लिए वह सामग्री महत्त्वपूर्ण है। योगिराज श्री अरविन्द ने भी वेदों के आध्यात्मिक रूपकों की व्याख्या में भाग लिया और उनके वैदिक निबन्ध इस विषय में मूल्यवान् हैं। श्री आनन्दकुमार स्वामी भारतीय कला के मार्मिक विद्वान् थे। उन्होंने कला के अभिप्रायों की भाँति वैदिक सृष्टि-विद्या के अभिप्रायों की बहुत ही रोचक और मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करने का मार्गदर्शन किया। उनके अनुसार वैसा कोई अर्थ या अभिप्राय उपनिषदों के अध्यात्म शास्त्र में नहीं है, जिसका मूल वेदों में नहीं। वेदों के सम्बन्ध में विचारों के विकास की कल्पना या किसी आदिम युग की विचार-पद्धति की कल्पना डॉ. कुमार स्वामी नहीं मानते। उनके शब्दों में ‘सनातन धर्म’ (शाश्वत दर्शन Philosophia Perennis) है, वे लिखते हैं-

मैं नहीं मानता कि उपनिषदों में ऐसे किसी तत्त्व का उपदेश है, जिसका परिज्ञान वैदिक ऋषियों को न था। यह भी नहीं माना जा सकता कि वैदिक मन्त्रों के कर्ताओं ने ऐसा-वैसा कुछ कह डाला, जिसका अर्थ उन्होंने ठीक न समझा हो। मन्त्रों की अध्यात्म-विज्ञानपरक सङ्गति सिद्ध करती है कि उनके रचयिता ऋषियों के मन में उनके अर्थों की कल्पना स्पष्ट थी। मेरे विचार में भारतीय विद्वानों को उचित है कि वे विश्वव्यापी सृष्टि-विज्ञान का, जो जगत् के साहित्य में विद्यमान है, उपयोग करके वैदिक विज्ञान की व्याख्या और समर्थन करें। वेदों का अर्थ भारतीय अध्यात्म-विद्या की व्याख्या न होकर विश्वव्यापी अध्यात्म-विद्या की व्याख्या है। भारतीय आत्म-विद्या की सहायता से पश्चिमी धर्म-ग्रन्थों के भी अनेक अभिप्रायों पर यथार्थ नया प्रकाश डाला जा सकता है। तत्त्वों में मेरी रुचि उनके सत्य होने के कारण है, न कि उनके भारतीय होने से। ‘सनातन धर्म’ या सनातनी आत्म-विद्या किसी एक काल, देश या जन विशेष की सम्पत्ति नहीं है, वह तो मानव जाति की जन्मसिद्ध सम्पत्ति है।

वस्तुतः वैदिक आत्म-विद्या के विषय में यह दृष्टिकोण समीचीन है। मत-मतान्तर के समर्थन के लिए वेदमन्त्रों की चरितार्थता नहीं है। आत्म-विद्या के जिज्ञासुओं के लिए मन्त्रों की भाषा और परिभाषाओं को स्पष्ट करने की आवश्यकता है। हमारी दृष्टि में वेदार्थ को अवगत करने के लिए ऊपर के सभी मतों में सत्य का अंश है। जिस विधि से मन्त्रों पर नया प्रकाश पड़े, जिस अर्थ से आत्म-विद्या का कोई नया क्षेत्र या पहलू प्रकाशित हो, वही दृष्टिकोण, प्रमाण या सामग्री स्वागत के योग्य है। वेद के जिज्ञासु छात्र का मन सब ओर से उन्मुक्त रहता है। उसके मन में चतुर्दिश दीप्ति पटों से प्रकाश और वायु का स्वच्छन्द प्रवेश होता है। वह आलोक का स्वागत करता है और उस महान् व्यापक ज्योति के लिए अपने चक्षु खोलता है, जो पृथिवी और द्युलोक के अन्तराल में भरी हुई है। मित्र और वरुण अथवा ऋत और सत्य नामक सृष्टि के द्वन्द्वात्मक तत्त्व की ही ज्योति हमारे भीतर-बाहर, सब ओर व्यापक है। इसी को ‘उरु-ज्योतिः’ कहा गया है। मित्रावरुण ने आर्य के लिए उरु-ज्योति उत्पन्न की-

उरुज्योतिश्चक्रथुरार्याय (ऋ. १/११७/२१)

इसका यह तात्पर्य लगाना कि यह महान् प्रकाश आर्य के लिए है, अनार्य के लिए नहीं, बुद्धि का कुण्ठित भाव है। वस्तुतः विश्व की महान् ज्योति पर किसी का स्वत्व नहीं है। आकाश, सूर्य, महाभूत, इनके समान यह ज्योति उनके लिए है, जिनके हृदय इसके प्रति स्फुरित हैं, गतिशील हैं, चैतन्य के स्पर्श से स्पन्दित हैं। जिसमें यह स्पन्दन और स्फूर्ति है, वही आर्य है, वही उस चैतन्य सत्र का ऋत्विक् है, अन्यथा जो जड़ता से मानसिक तन्द्रा में अस्त है, उसके लिए न ये विचार हैं और न इस ज्योति की किरणें उसके मन की सतरंगी वर्ण पट्टी पर कुछ प्रभाव डालती हैं।

‘उरु-ज्योतिः’ के इन लेखों में वैदिक आत्म-विद्या का कोई क्रमिक अध्ययन नहीं है, इसमें उसके आलोक की कुछ बिखरी हुई किरणें ही हैं, किन्तु इनके पीछे आत्म-विद्या विषयक निष्ठा है। उसके साथ-साथ यह विश्वास भी है कि समस्त भारतीय वाङ्मय में वह अन्तर्यामी सूत्र फैला हुआ है। उसके कुछ ही विचार परमाणुओं पर प्रतिफलित ज्योति की ये रश्मियाँ सङ्ग्रहीत की गई हैं। आश्रमविषयक योग क्षेम’ नामक लेख उत्तर-गर्भित प्रश्नमुखी शैली से उन अनेक परिभाषाओं की ओर ध्यान खींचता है, जिनकी अमित व्याख्या वेदार्थ के लिए आवश्यक है और जिनकी बारहखड़ी से आत्म-विद्या का यह विवेचन आगे बढ़ाया जा सकता है।

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